स्वाइन फ्लू को महामारी बताना गलत, ये दवा कंपनियों की साज़िश है
January 11, 2010, 10:40 AM
एजेंसियां / ब्लॉग
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लंदन। क्या स्वाइन फ्लू महामारी नहीं थी? क्या देश-विदेश की कई बड़ी दवा कंपनियों ने इसके महामारी होने की फर्जी मुहिम चलाई और भय पैदा कर अरबों की रकम कमा डाली? 'काउंसिल ऑफ यूरोप' के हेल्थ-केअर हेड डॉ.वोल्फगैंग वोडार्ग के मुताबिक, फ्लू की दवा और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों ने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन पर दबाव डालकर इस रोग को महामारी घोषित कराने में अहम भूमिका निभाई। उनका कहना है कि यह इतना जानलेवा रोग नहीं है जितना कि प्रचारित किया जा रहा है।
ब्रिटिश अखबार 'डेली मेल' के मुताबिक, डॉ. वोडार्ग ने इस बारे में दवा फर्मों की संदेहास्पद भूमिका की जांच की मांग की है। अच्छी बात तो ये है कि उनके प्रस्ताव को काउंसिल ऑफ यूरोप ने पास भी कर दिया है। फ्रांस के स्ट्रैबर्ग स्थित ये काउंसिल 'यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स' के प्रति जवाबदेह है। अब इस महीने के आखिर में इमरजेंसी डिबेट होगी।
डॉ.वोल्फगैंग वोडार्ग ने कहा है कि ये इस सदी के सबसे बड़े मेडिकल स्कैंडलों में से एक है। उन्होंने बताया कि स्वाइन फ्लू से भय के बीज पांच साल पहले ही बो दिए गए थे। तब ये डराया गया कि बर्ड फ्लू का ज्यादा जानलेवा वायरस मानव में पनपेगा। तब सरकारों ने एंटी फ्लू दवा टैमीफ्लू को जमा करना शुरू कर दिया। टीके के लाखों डोज के 'स्लीपिंग कॉन्ट्रैक्ट' हो गए। सरकारों ने टीके की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। अब टीके बनाने वालों को कोई आर्थिक खतरा नहीं था। इन्होंने इंतजार किया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे महामारी घोषित करे, ताकि 'कॉन्ट्रैक्ट एक्टिव' हों।
उनके मुताबिक, दवा कंपनियों ने अपने लोगों को विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्ल्यूएचओ और दूसरे प्रमुख संगठनों के गलियारों में तैनात कर दिया। हो सकता है कि इसी दबाव की वजह से डब्ल्यूएचओ ने महामारी की परिभाषा नरम कर दी और पिछले साल जून में इसे विश्वव्यापी महामारी घोषित कर दिया वो भी लाखों लोगों को पर्याप्त ढंग से टेस्ट किये और टीका दिये बगैर ही। बीमारी के लक्षण जांचने के लिए पर्याप्त क्लीनिकल ट्रायल्स भी नहीं कराए गए।
उधर, ब्रिटेन में सरकार के इम्यूनाइजेशन हेड अब लीपापोती में जुट गए हैं। उन्होने कहा है कि डॉ.वोल्फगैंग वोडार्ग के दावे आधारहीन हैं। एंटी फ्लू दवा और टीके बनाने वाली कंपनी जीएसके के प्रवक्ता ने कहा कि स्वाइन फ्लू के महामारी के पैमाने पर आने के बाद ही डब्ल्यूएचओ ने फैसला लिया। फैसले पर प्रभाव डालने की बात गलत है। |