नानाजी देशमुख नहीं रहे, धार्मिक नगरी चित्रकूट में ली अंतिम सांस
February 27, 2010, 3:35 PM
हिंदी ख़बर संवाददाता
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चित्रकूट। जाने-माने समाजसेवी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक श्री नानाजी देशमुख का शनिवार को यहां लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वो 93 वर्ष के थे। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार नानाजी का निधन शाम को जानकीकुण्ड के सदगुरू सेवासंघ ट्रस्ट अस्पताल में हुआ। नानाजी के सामाजिक कार्यो को देखते हुए उन्हे साल 1999 में राज्यसभा सदस्य बनाया गया था। इसके पहले साल 1977 में बलरामपुर से उन्हें लोकसभा के लिए चुना गया था। सामाजिक कार्यो विशेषकर चित्रकूट क्षेत्र में भू-जल संरक्षण और पर्यावरण के क्षेत्र में काम के लिए उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा गया था।
नानाजी देशमुख ने साल 1991 में चित्रकूट में एक विश्वविद्यालय की भी स्थापना की थी। इसका नाम चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय रखा गया था, हालांकि बाद में मध्यप्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने विश्वविद्यालय के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाना शुरू कर दिया। इससे नाराज़ होकर नानाजी ने विश्वविद्यालय से खुद को अलग कर लिया था। बाद में इसी विश्वविद्यालय का नाम बदल कर महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय रख दिया गया।
इसके अलावा उन्होने चित्रकूट में 2 इंटर-कॉलेज, एक आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज 'आरोग्य धाम' और एक रीसर्च सेंटर 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान' की भी स्थापना की थी। धार्मिक नगरी चित्रकूट और आस-पास के क्षेत्र के विकास का श्रेय पूर्ण-रूपेण नानाजी को ही दिया जाता है।
महाराष्ट्र के परभणी ज़िले के कडोली गांव में 11 अक्टूबर 1916 को जन्मे नानाजी देशमुख का असली नाम चण्डीराव देशमुख था। शरद पूर्णिमा पर अपने घर पर बेटे के आगमन पर उनके पिता श्री चण्डीदास अप्पा साहेब देशमुख और मां श्रीमती अन्नपूर्णा देवी फूले नहीं समा रहे थे। बचपन में ही नानाजी की मां का देहान्त हो गया था। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए वो समाजसेवा और परोपकार में जुट गए थे।
नानाजी को सत्ता का लालच कभी नहीं रहा। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 1977 में जब इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के बाद, जनता पार्टी (जनसंघ के विलय के बाद) की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने उन्हे कैबिनेट मंत्री का पद ऑफर किया था जिसे नानाजी ने ठुकरा दिया था। नानाजी ने कहा था कि राजनीति मेरे लिए करियर नहीं, बल्कि मिशन है और इसके ज़रिए मैं समाजसेवा करना चाहता हूं। नानाजी पंडित दीनदयाल उपाध्याय को अपना आदर्श मानते थे। अटल बिहारी बाजपेई के साथ उनकी अच्छी निभती थी। 1947 में जब आरएसएस ने 'राष्ट्र धर्म' अखबार निकालना शुरू किया था तो पं.दीनदयाल मार्गदर्शक, अटल जी संपादक और नानाजी प्रबंध निदेशक बनाए गए थे। इसके अलावा नानाजी ने 'पांञ्चजन्य' और 'दैनिक स्वदेश' के भी प्रकाशन की शुरूआत की थी।
नानाजी भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने अपना कैरियर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में प्रचारक के रूप में उत्तर प्रदेश में शुरू किया था। उनका पार्थिव शरीर लोगों के दर्शनार्थ सियाराम कुटीर स्थित उनके निवास-स्थान पर रखा गया है। अंतिम संस्कार की तिथि की घोषणा नहीं की गई है। नानाजी के सहायक के तौर पर भरत पाठक कार्यभार संभाल रहे हैं और पाठक को ही नानाजी के उत्तराधिकारी के तौर पर ज़िम्मेदारियां सौंपे जाने की उम्मीद है।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी तथा मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्रियों के उनकी अंत्येष्टि में भाग लेने की संभावना है। इस बीच बीजेपी के उत्तरप्रदेश अध्यक्ष डॉ.रमापति राम त्रिपाठी ने नानाजी के निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है और कहा है कि इससे पार्टी की अपूरणीय क्षति हुई है। |