मौत का मुआवज़ा नहीं देंगी मायावती, कृपालु बाबा ने फिर रखा भंडारा
March 6, 2010, 4:46 AM
हिंदी ख़बर
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लखनऊ/मथुरा। यूपी सरकार की माली हालत इतनी खस्ता हो गई है कि उसके पास सुल्तानपुर के कुंडा के मंदिर में हुई भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवारवालों को मुआवज़ा देने के लिए तक भी पैसे नहीं बचे हैं। मुख्यमंत्री मायावती का कहना है कि उनका राज्य गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है इसलिए सरकार प्रतापगढ़ में रामकृपालु महाराज के आश्रम में मची भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों या घायलों को मुआवजा नहीं दे सकती है। उन्होंने केंद्र सरकार से पीड़ितों को मुआवजा देने की गुहार लगाई।
गौरतलब है कि गुरुवार को प्रतापगढ़ जिले के कृपालुजी महाराज के आश्रम में मची भगदड़ में 63 लोगों की मृत्यु हो गई थी। इस हादसे में अनेक लोग घायल भी हो गए। पुलिस ने मंदिर मैनेजमेंट के खिलाफ आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज किया था।
और तो और कृपालु महाराज के भंडारे में भगदड़ मचने से 63 लोगों की जान चली गई लेकिन शायद कृपालु महाराज को इससे कोई लेना देना नहीं है। तभी तो हादसे के दो दिन बाद ही उन्होंने वृंदावन में एक और भंडारा रख लिया। ये भंडारा भी कोई छोटा-मोटा भंडारा नहीं है बल्कि इसके लिए करीब 10 हजार लोगों को निमंत्रण भी दिया गया।
वृन्दावन में जगदगुरु धाम कृपालु महाराज का आश्रम है। यहां भंडारे को देखकर कहीं से नहीं लगता कि प्रतापगढ़ के कुंडा में कृपालु आश्रम में मची भगदड़ का यहां जरा भी असर पड़ा है। कुंडा के कृपालु आश्रम में 63 लोगों की मौत हो गई लेकिन इसके बावजूद वृंदावन में विशाल भंडारा हुआ। यही नहीं प्रशासन की मनाही के बावजूद साधुओं को नोटों के लिफाफे बांटे गए।
हैरानी की बात ये है कि इस बार भी भंडारे के लिए प्रशासन से इजाजत नहीं ली गई है। जब इसके लिए आश्रम प्रवक्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अगर किसी के घर में कोई फंक्शन हो तो उसके लिए इजाजत नहीं ली जाती। हालांकि स्थानीय प्रशासन ने अपनी तरफ से तैयारी शुरू कर दी हैं क्योंकि कुंडा में मची भगदड़ के बाद प्रशासन किसी तरह की कोताही बरतने के लिए तैयार नहीं है।
आश्रम के रवैये से साफ है कि दो दिन पहले हुए हादसों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन शायद वो ये भूल गए हैं कि जिन श्रद्धालुओं के प्रति वो इतनी बेरुखी दिखा रहे हैं अगर उन्होंने ही साथ छोड़ दिया तो फिर ये तामझाम खत्म होते देर नहीं लगेगी। वैसे इस बार नजर पुलिस और प्रशासन की तरफ भी है कि क्या बिना उनकी सहमति के इस तरह के भंडारे की इजाजत दी जानी चाहिए या नहीं। |