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बांदा: लचर व्यवस्था के कारण गई 65 बच्चों की जान

Edited By: Shivani
Updated On : 2017-09-01 16:16:30
बांदा: लचर व्यवस्था के कारण गई 65 बच्चों की जान via
बांदा: लचर व्यवस्था के कारण गई 65 बच्चों की जान

बांदा। जिला अस्पताल महिला व पुरुष में तीन महीने के अन्दर तीन प्रसूताएं व 65 बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें से 49 भ्रूण ने कोख में ही दम तोड़ दिया। अस्पताल में खराब व्यवस्था, डॉक्टरों की कमी के कारण इतनी मौते हुई है।

पुरुष अस्पताल में मरीजों की संख्या बेड की संख्या की तुलना में कई गुना अधिक है। यहां बेड की संख्या सिर्फ 108 है। जिला अस्पताल में कुपोषित बच्चों का अलग से वार्ड बना है, लेकिन अत्याधुनिक स्तर पर उसमें भी इलाज की कोई सुविधा नहीं है।

अस्पताल में डॉक्टर की भी कमी है। सब बच्चों की जिम्मेदारी सिर्फ एक डॉक्टर के कंधे पर है। तकनीकी स्तर पर बच्चों के इलाज के नाम पर जिला पुरुष अस्पताल में कोई व्यवस्था नहीं है। यदि दवाओं की बात की जाएं तो इस समय बच्चों की जरूरतमंद की 70 फीसद दवाएं नहीं हैं। छोटे बच्चों को एंटीबायोटिक सिरप, दर्द के सिरप समेत कई दवाएं नहीं हैं।

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जिला अस्पताल महिला की स्थिति की बात करे तो, प्रसूता कक्ष में साफ-सफाई का अभाव, डिलेवरी के कुछ घंटे बाद छुट्टी और डॉक्टरों की लापरवाही यहां की आदत बन गया है। जिला अस्पताल महिला पर जच्चा-बच्चा मौत को लेकर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इन सब के बावजूद व्यवस्थाओं में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि जिला महिला और पुरुष अस्पताल में डॉक्टरों की बेहद कमी है। बस किसी तरह से मरीजों का इलाज किया जा रहा है। पुरुष अस्पताल की स्थिति तो यह हो गई है कि बंदी की कगार पर पहुंच गया है।

गंभीर बच्चों की संख्या से काफी कम एनआईसीयू में वारमर मशीने हैं। ऐसे में एक बच्चे को पूर्ण स्वस्थ्य होने से पहले यदि मशीन से हटाया गया तो उसकी जान को खतरा हो सकता है, जबकि अन्य अभिभावकों के गंभीर नवजात मशीन के इंतजार में रहते हैं। आखिर में डॉक्टर उन्हें रेफर की सलाह दे देते हैं।

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महिला अस्पताल में औसतन 26 बच्चे एक दिन में जन्म लेते हैं। ऐसे में सभी को नियमानुसार बेड उपलब्ध कराना मुश्किल है। अस्पताल में महज 36 प्रसतूओं को भर्ती करने की व्यवस्था है। इनमें कई प्रसूताओं की स्थिति गंभीर होने पर कई कई दिनों तक इलाज चलने के कारण भर्ती रहती हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादातर प्रसूताओं को जांच पड़ताल के बाद जन्म के कुछ घंटे बाद ही अस्पताल से घर भेज दिया जाता है।

बता दें कि जिला महिला अस्पताल में पिछले तीन महीने में गर्भ में 49 की मौत हो गई। डॉक्टरों, लेटलतीफी, गर्भ के दौरान देखरेख का अभाव आदि की कमी के कारण यह मौते हुई। जून महीने में 17 नवजात बच्चों की जन्म से पहले मौत हो गई। जुलाई में 23 और अगस्त में 9 बच्चों ने दम तोड़ दिया। इसके साथ ही हर महीने तीन प्रसूताओं ने भी बच्चों के जन्म के समय दम तोड़ दिया।

 


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