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उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम बनाएंगे मायावती की सरकार

Edited By: Editor
Updated On : 2016-11-01 18:31:12
उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम बनाएंगे मायावती की सरकार
उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम बनाएंगे मायावती की सरकार

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के भीतर पारिवारिक कलह सुलझने का नाम नहीं ले रही है जिसकी वजह से सपा का सदाबहार मुस्लिम वोट बैंक खिसक रहा है। ऐसा लगने लगा है कि लंबे समय से सपा के वफादार रहे मुस्लिम मतदाता अब मायावती की बहुजन समाज पार्टी की ओर रुख कर सकते हैं।

दरअसल, मुसलमान मतदाता टेक्निकल वोटिंग करते रहे हैं। उनका वोट उस पार्टी को ही मिलता है जो बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने में सक्षम हो। इसलिए जाहिर है कि मुसलमानों का वोट इस बार मायावती के खाते में जा सकता है।

आगामी विधानसभा चुनाव में सत्तासीन अखिलेश सरकार को कुनबे में घमासान और एंटी कन्वेंसी का नुकसान तो होगा ही, इसके साथ ही प्रदेश का लॉ एंड ऑर्डर भी बड़ा मुद्दा होगा। हालांकि आगामी विधानसभा चुनावों में यही मुद्दा प्रमुख रहने वाला था, लेकिन सपा परिवार में मचे हालिया खींचतान के बाद से सपा के पक्ष में मुसलमानों का झुकाव तेजी से घटा है।

जानकारों की माने तो यूपी में इस बार 24 प्रतिशत दलित और 19 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का कॉम्बिनेशन बेहद कारगर साबित हो सकता है और अगर ऐसा होता है तो मायावती को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता है।

उल्लेखनीय है उत्तर प्रदेश में बीजेपी को सत्ता से रखने में मुस्लिम बड़े पैमाने पर समाजवादी पार्टी को वोट देते रहे हैं, लेकिन अब नए विकल्प रुप में उनके पास बहुजन समाज पार्टी तैयार हैं, जिससे बीजेपी को सत्ता में आने से रोका जा सकता हैं।

मुसलमानों के लिए उनका प्रमुख मुद्दा बीजेपी को सत्ता में पहुंचने से रोकना है और कांग्रेस की कमजोरी के चलते उनके पास मजबूत विकल्प के तौर पर सिर्फ बसपा ही बचती है। शायद यही वजह है कि बसपा सुप्रीमो मायावती भी लगातार बीजेपी और पीएम मोदी के खिलाफ हमलावर हैं जिससे मुस्लिम समुदाय को अपने साथ आसानी से लाया जा सके।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारुखी के मुताबिक सपा में जितना ज्यादा झगड़ा होगा, अल्पसंख्यकों में उतनी ही उलझन बढ़ेगी। मुस्लिम पहले ही दूसरे विकल्प की तलाश शुरू कर चुके हैं, जो स्वाभाविक रूप से अब बसपा ही है।

आंकड़े भी यही बात कहते हैं। आंकड़ों के मुताबिक काफी लंबे समय से बीजेपी को रोकने और सपा को सत्ता तक पहुंचाने के लिए 19% वोट शेयर वाले मुसलमान मतदाता रणनीतिक वोटिंग करता रहा है, लेकिन अब यह पुरानी बात हो गई है। पिछले आंकड़ों से भी यह पता चलता है कि सपा और बीएसपी को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में 4 से 5 फीसदी वोट ही जिम्मेदार है। इसे विस्तार से समझने के लिए निम्न आंकड़ों पर नज़र डालना जरूरी है-

साल 2007:
साल 2007 में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तब मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला चलाया था, जिसके बाद बसपा की 206 सीटें आईं थी जबकि सपा केवल 97 सीटों पर सिमट गई थी। इस चुनाव में बीएसपी को 30.43 % मत मिले थे और सपा को 25.43% वोट मिले थे। केवल 5 फीसदी वोटों से बीएसपी को सत्ता की सवारी का सुख मिल गया था।

साल 2012:
साल 2012 में राज्य में सत्ता विरोधी लहर थी, जिससे मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा 29.14% वोट शेयर के दम पर 224 सीटों पर काबिज हुई। वहीं, मायावती की पार्टी बसपा को 25.91% वोटों के साथ 80 सीटों से संतोष करना पड़ा था। दोनों पार्टियों के वोट शेयर में महज 3 प्रतिशत से कुछ ज्यादा का ही अंतर था।

आपको बता दें कि इस दफा भी 19% मुस्लिम वोट दांव पर हैं। सपा के अंदरूनी घमासान के चलते अल्पसंख्यक मतदाता इस बार सपा की साइकिल से पल्ला झाड़ कर, मायावती के हाथी की सवारी करने का मन बना चुके हैं। ऐेसे में अगर मायावती के परंपरागत 24 प्रतिशत दलित वोट के साथ 19 फीसदी मुसलमान वोट जुड़ जाता हैं तो इसकी अधिक संभावना है बसपा की सीटों का आंकड़ा 250 के पार चला जाए।

हालांकि बीएसपी को सत्ता में आने के लिए साल 2012 में मिले 25.91% वोटों में सिर्फ 5 प्रतिशत वोट ही जोड़ने की ज़रूरत है। इस लिहाज़ से बीजेपी और कांग्रेस के लिए यह दूर की ही कौड़ी प्रतीत होती है।


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