कहीं आप के बच्चे को भी तो नहीं है 'इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर ?

Edited by: Priyanka Updated: 16 Jan 2018 | 05:29 PM
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नई दिल्ली। सूचना तकनीक और इंटनेट ने जिस तरह तरक्की की है, इससे मानव की जीवनशैली ही बदल गई है। शायद ही ऐसा कोई होगा, जो इस बदलाव से अछूता है। बच्चे और युवा तो सूचना तकनीक से इस कदर प्रभावित हैं कि एक पल भी वो स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। एक तरह से इनमें हर वक्त नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे 'इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर' कहा गया है।

रिलायंस जियो ने मोबाइल डेटा के क्षेत्र में जिस तरह की जंग छेड़ी है, उसने इस समस्या को और विकराल कर दिया है। लगभग सभी कंपनियां बेहद कम पैसों में असीमित डेटा ऑफर कर रही हैं, जिसका बच्चे और युवा खुलकर लुत्फ उठा रहे हैं। ऐसे में चिंता की बात है कि इसका इस्तेमाल वो सारा दिन फेसबुक, ट्विटर, स्काइप और सबसे गंभीर मुद्दा पॉर्नोग्राफिक साइटों को ब्राउज करने में लगे रहते हैं।

दक्षिणी दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में मेंटल हेल्थ और विहेवियरल साइंस विभाग के प्रमुख डॉ. समीर मल्होत्रा ने कहा, "समस्या तो पहले से ही थी, लेकिन हाल के दिनों में हालत और बदतर हुई है। कच्ची उम्र के बच्चे जो सही और गलत में फर्क नहीं कर पाते वो पॉर्नोग्राफी के कुचक्र में आसानी से फंस जाते हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "पढ़ने-लिखने और अन्य रचनात्मक कार्यो में अपना समय देने के बदले वो अश्लीलता के दलदल में फंस रहे हैं और अपना कीमती वक्त मोबाइल पर खर्च कर रहे हैं। ऐसे बच्चों की तादाद तेजी से बढ़ रही है, जिनकी सबसे बड़ी जरूरत सिर्फ और सिर्फ मोबाइल डेटा है।"

डॉ.मल्होत्रा ने कहा, "हमारे पास अभिभावक अपने बच्चों को इलाज के लिए लेकर आते हैं। कई बच्चे तो पूरी तरह वर्चुअल दुनिया में खोए रहते हैं। एक बच्चा तो ऐसा था कि उसे मोबाइल इस्तेमाल करने के चक्कर में ये भी पता नहीं चल पाता था कि उसने पैंट में ही पॉटी कर दी है।"

महानगरों में ये मानसिक बीमारी इस कदर बढ़ चुकी है कि कई युवाओं को तो स्वास्थ्य सुधार केंद्र में भर्ती कराना पड़ रहा है। हालात ये हैं कि यदि इस पर काबू नहीं पाया गया, तो समाज में एक नई विकृति पैदा हो सकती है। इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर के लक्षण हर शहर के युवाओं में उभरने शुरू हो चुके हैं। इससे पहले कि युवा इस रोग की चपेट में पूरी तरह आ जाएं, ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है।

इस बारे में डॉ. मल्होत्रा ने कहा, "मोबाइल इंटरनेट ने सबसे बड़ा बदलाव मानव की जीवनशैली पर डाला है। रात को सोने के बजाय लोग मोबाइल पर नजरें टिकाए रहते हैं। लंबे समय तक ऐसा करने से नींद न आने की समस्या हो जाती है। जैसे-जैसे अंधेरा छाता है दिमाग में मेलेटॉनिन की मात्रा बढ़ती जाती है, जिससे हमें नींद आती है लेकिन जब हम नींद को नजरअंदाज करते हुए मोबाइल पर नजरें टिकाए रहते हैं तो मेलेटॉनिन का बनना बंद हो जाता है। इससे नींद न आने की बीमारी (इंसोम्निया) हो जाती है।"

उन्होंने कहा, "सबसे बेहतर यही है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें। सप्ताह में एक दिन सिर्फ छुट्टी के दिन ही मोबाइल उनके हाथ में दें। बच्चा इंटरनेट पर क्या ब्राउज करता है, उसपर भी नजर रखें। बच्चों को तकनीक का सही इस्तेमाल करना सिखाएं।"