जयंती विशेषः भारत की आयरन लेडी थी इंदिरा गांधी

Author: Hindi Khabar
Updated On : 2016-11-19 16:26:56
जयंती विशेषः भारत की आयरन लेडी थी इंदिरा गांधी

नई दिल्ली। भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आज जयंती है। इंदिरा भारत की पहली ऐसी महिला है जिन्हें आयरन लेडी कहा जाता है। इंदिरा का शासन काल हर किसी शख्स को याद रखता है, क्योंकि वह पहली महिला प्रधानमंत्री है, जिन्होंने पाकिस्तान को धूल चटा दी थी।

साल 1971 में जब पाकिस्तान का मुकाबला भारत से हुआ था। 25 अप्रैल 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक मीटिंग में भारत के थल सेनाध्यक्ष से कहा था कि पाकिस्तान को सबक सीखना जरूरी हो गया है।

उस समय इंदिरा ने यह बात इसलिए कहीं थी, क्योंकि जो हिस्सा आज बांग्लादेश कहलाता है वो हिस्सा एक समय में पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था और पाकिस्तान की सरकार उन लोगों पर जुल्म कर रही थी।

खुद पर हो रहे जुल्म के खिलाफ लोगों ने जब आवाज उठाई तो सरकार नरसंहार पर उतारू हो गई। अपनी जान बचाने के लिए लोगों देश को छोड़कर भारत के कई हिस्सों में जाने लगे। उस वक्त एक अखबार में छपी रिपोर्ट यह बताती है कि पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे नरसंहार के कारण करीब 10 लाख लोग भारत में शरणार्थी बन गए थे।

उस समय प्रधानमंत्री होने के कारण इंदिरा गांधी पर सरकार और विपक्ष द्वारा यह दवाब बनाया जा रहा था कि वो इन लोगों को देश से बाहर निकालें। साथ ही समय आने पर उचित कार्रवाई करें। हालातों को समझने के बाद इंदिरा गांधी ने भारतीय सेना को युद्ध करने का आदेश दिया था।

वहीं, दूसरी तरफ पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर दवाब बनाने की कवायद भी तेज कर दी थी। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर के साथ हुई इस बैठक में इंदिरा ने साफ शब्दों में कहा था कि यदि अमेरिका सही समय पर पाकिस्तान नहीं रोकेगा तो भारत पाकिस्तान पर सैन्य कार्रवाई करने के लिए मजबूर हो जाएगा।

पाकिस्तान की समस्या को पाकिस्तान अपना अंदरूनी मामला बता रहा था लेकिन इंदिरा ने साफ कर दिया पूर्वी पाकिस्तान में जो हो रहा है वो पाकिस्तान का अंदरूनी मामला नहीं है। क्योंकि उसकी वजह से भारत के कई राज्यों में शांति भंग हो रही थी।

इंदिरा ने पूर्वी पाकिस्तान पर उठ रहे हर सवाल का पूरी मजबूती से जवाब दिया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक तरफ पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक घेराबंदी कर रही थीं और दूसरी तरफ दुनिया भर में भारत के पक्ष में समर्थन जुटा रही थीं।

पाकिस्तान की तरफ अमेरिका के नरम रवैए को देखते हए इंदिरा ने 9 अगस्त 1971 को सोवियत संघ के साथ एक ऐसा समझौता किया जिसके तहत दोनो देशों ने एक दूसरे की सुरक्षा का भरोसा दिया।

भारतीय सेना तैयार थी, पाकिस्तान भी युद्ध करने की तैयारियां कर चुका था लेकिन अब सवाल उठ रहा था कि पहले हमला कौन करेगा। हालांकि युद्ध के लिए भारत पहले से ही तैयार है इसका अंदाजा पाकिस्तान नहीं लगा पाया और 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर गोलीबारी शुरू कर दी।

गोलीबारी की जानकारी मिलते ही इंदिरा मैप रूप पहुंची, हालातों का जायजा लेते ही इंदिरा ने कैबिनेट की बैठक की। इस बैठक में इंदिरा ने विपक्ष और पक्ष दोनों को हालातों के बारे में अवगत कराया और आधी रात को रेडियो के जरिए पूरे देश को संबोधित किया।

सेना ने रणनीति तय करते हुए भारतीय सेना को ढ़ाका की तरफ बढ़कर पाकिस्तान पर हमला करने के लिए कहा। वहीं, दूसरी तरफ भारतीय वायुसेना ने पश्चिमी पाकिस्तान पर गोलीबारी शुरू कर दी। 3 दिसंबर के हमले का जवाब भारत ने आपरेशन ट्राइडेंट शुरु करके दिया था।

4 दिसंबर, 1971 को आपरेशन ट्राइडेंट शुरू हुआ। भारतीय नौसेना ने भी युद्ध के दो मोर्चे संभाल रखे थे। एक था बंगाल की खाड़ी में समुद्र की ओर से पाकिस्तानी नौसेना को टक्कर देना और दूसरा पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का मुकाबला करना।

5 दिसंबर को भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर जबरदस्त बमबारी कर पाकिस्तानी नौसैनिक मुख्यालय को तबाह कर दिया। पाकिस्तान पूरी तरह घिर चुका था। इसी बीच पाकिस्तान को झटका देते हुए इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाने का ऐलान कर दिया।


इंदिरा की इस घोषणा का मतलब था कि बांग्लादेश अब पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बल्कि एक स्वंत्रत्र राष्ट्र होगा। भारत ने युद्ध में जीत से पहले ही ये फैसला इसलिए किया जिससे युद्धविराम की स्थिति में बांग्लादेश का मामला यूनाइटेड नेशन्स में लटक न जाए।

उधर अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद के लिए अपनी नौसेना का सबसे शक्तिशाली सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की तरफ भेज दिया जिसके जवाब में इंदिरा ने सोवियत संघ के साथ हुई संधि के तहत उन्हें अपने जंगी जहाजों को हिंद महासागर में भेजने के लिए कहा।

इस तरह से दो महाशक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल हो चुकी थीं। इंदिरा गांधी ने फैसला लिया कि अमेरिकी बेड़े के भारत के करीब पहुंचने से पहले पाकिस्तानी फौज को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना होगा, जिसके बाद थल सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेक शॉ ने तुरंत पाकिस्तानी फौज को आत्मसमर्पण की चेतावनी जारी कर दी।


पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान की सेना के कमांडर जनरल ए ए के नियाजी ने अमेरिका और चीन के दम पर सरेंडर से इंकार कर दिया, उस वक्त तक भारतीय सेना ढाका को 3 तरफ से घेर चुकी थी। 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने ढाका में पाकिस्तान के गवर्नर के घर पर हमला किया, उस वक्त वहां पाकिस्तान के सभी बड़े अधिकारी गुप्त मिटिंग के लिये इकट्टा हुए थे।

इस हमले से पाकिस्तानी फौज के हौसले पस्त हो गए। जनरल नियाजी ने तुरंत युद्ध विराम का प्रस्ताव भिजवा दिया। लेकिन भारतीय थलसेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ ने साफ कर दिया कि अब युद्ध विराम नहीं बल्कि सरेंडर होगा।

मेजर जनरल जे एफ आर जैकब को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई, इसके बाद कोलकाता से भारत के पूर्वी कमांड के प्रमुख लेफिटेनेंट जेनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ढाका पहुंचे। अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और 16 दिसंबर 1971 को सरेंडर करने की प्रक्रिया शुरू हो गई।

 पाकिस्तानी कमांडर नियाजी ने पहले लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा के सामने सरेंडर के कागज पर दस्तखत किए और फिर अपने बिल्ले उतारे।

सरेंडर के प्रतीक के तौर पर नियाजी ने अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। पाकिस्तान के सरेंडर के साथ ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ये एलान कर दिया।

भारत ने सिर्फ 14 दिन में पाकिस्तानी फौज को हथियार डालने के लिए मजबूर कर दिया और इस तरह इंदिरा ने पाकिस्तान को तोड़ दिया उसके 2 टुकड़े कर दिए।

 


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