बंगाल और झारखंड में दैत्य महिषासुर की होती है पूजा

Author: Hindi Khabar
Updated On : 2016-10-08 16:08:22
 बंगाल और झारखंड में दैत्य महिषासुर की होती है पूजा

नई दिल्ली। नवरात्रि की धूम चारों तरफ देखने को मिल रही है। दुर्गा पूजा का त्योहार केवल देवी मां की पूजा के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। दुर्गा पूजा का मतलब असुरों का नाश भी है। इस पूजा के दौरान मां दुर्गा असुरों का नाश करती हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। आपने देखा होगा कि दुर्गा मां के पंडाल में दानव महिषासुर का दहन करते हुए देवी मां का रूप दिखाया जाता है, लेकिन क्या हम इसके पीछे के इतिहास को जानते हैं। आपने ज्यादा तर जगहों पर दुर्गा मां की पूजा करते हैं देख और सुना होगा, लेकिन बंगाल और झारखंड में कई ऐसे जिले हैं जहां हजारों लोग महिषासुर का त्योहार मनाते हैं और उन्हें पूजते हैं।

हाल ही की एक रिपोर्ट से पता चला है कि झारखंड और बंगाल में असुर आदिवासी प्रजाति के 26 हजार लोग हैं, जो महिषासुर को अपना देवता मानते हैं। उनका मानना है कि महिषासुर उनके राजा थे और देवी ने अपने हाथों से उनका वध किया था। जहां एक ओर हम दुर्गा पूजा को जश्न के साथ मनाते हैं क्योंकि इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत हुई थी, दूसरी ओर असुरों के गांव में मातम फैला होता है। वे अपने राजा को याद करके गम में डूबे रहते हैं।

पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड समेत पांच राज्यों में फैली कुछ जनजातियां महिषासुर को एक महान राजा मानती हैं और 'असुर' जैसी कुछ जनजातियां खुद को उनका वंशज मानती हैं। असुर जनजाति झारखंड के गुमला, लातेहार, लोहरदग्गा और पलामू जिलों में और उत्तरी बंगाल के अलीपुरद्वार जिलों में पाई जाती है। असुर और सांथल रीति रिवाजों में महिषासुर की पूजा की जाती है।

दुर्गा पूजा में महिषासुर को एक असुर बताकर मां देवी के चरणों में झुका दिया जाता है। लेकिन कई प्रजाति ऐसी हैं जो महिषासुर की पूजा करती हैं। संथाल जनजाति भी महिषासुर के नाम के लोकगीत गाती हैं। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में महिषासुर की पूजा के लिए एक भव्य मेला आयोजित किया जाता है। बंगाल के संथालों में महिषासुर को एक वीर के रूप में दिखाया जाता है। ये जाति इसका विरोध करती है कि महिषासुर को दैत्य क्यों बनाया जाता है और मां उनका नाश क्यों करती हैं।

 


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