सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है ये लेडी सुल्तान

Author: Hindi Khabar
Updated On : 2016-10-13 18:41:04
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है ये लेडी सुल्तान

देहरादून। महिला होकर पुरुष पहलवानों को पटखनी देकर सुर्खियों बटोरने वाली उत्तराखंड की 'लेडी सुल्तान' नेहा तोमर आज की पीढ़ी के लिए एक मिसाल हैं। नित सफलता के नए आयाम छूने वाली लेडी सुल्तान का जीवन काफी उतार-चढ़ाव से भरा है। लगन की पक्की नेहा अपने मकसद को लेकर आगे बढ़ती रहीं लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। उसकी हिम्मत और मेहनत का ही नतीजा है कि आज वह पुरुष पहलवानों को धूल चटा रही है।

नेहा की सबसे बड़ी खासियत ये है कि वह सिर्फ पहलवान ही नहीं बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव की जीती जागती मिसाल हैं। मुस्लिम और हिंदू परिवारों की चिराग नेहा का दिल दोनों परिवारों के लिए बराबर धड़कता है। दिलचस्प ये भी है कि वह अपनी उपलब्धि का श्रेय अपने मुंहबोले माता-पिता को देती हैं। लेकिन प्यार दोनों परिवारों पर बराबर करती है।

देहरादून से करीब 45 किलोमीटर के दूर विकासनगर तहसील का ढकरानी नाम का गांव है। इसी गांव में इस्लामुद्दीन का घर है। फरजाना उर्फ नेहा इस्लामुद्दीन व सलमा की बेटी हैं। फरजाना के नेहा बनने की कहानी कुछ यूं है- 2011 में फरजाना की मुलाकात हिमाचल के सिरमौर जिले के कलेथा गांव की बबीता तोमर से हुई। बबीता तब फाइनेंस कंपनी में कार्य करती थी। धीरे-धीरे फरजाना बबीता से घुल-मिल गई और उसे बड़ी बहन मानने लगी।

फरजाना ने बबीता के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह उनके साथ ही कलेथा में रहेगी। फिर वह कलेथा चली गई और वहां वह बबीता के परिजनों से नेहा नाम से रूबरू हुई। नेहा ने बबीता की माता गुरुदेई और पिता पंचराम तोमर को अपना माता-पिता मान लिया।

पहलवानी में जलवे बिखेर रही नेहा सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी है। मुस्लिम परिवार में उसका जन्म हुआ और हिंदू परिवार ने उसे सहारा दिया। कलेथा में पंचराम का परिवार यह जानता था कि नेहा मुस्लिम है, लेकिन उसने उसे बेटी तरह ही अपनाया। स्कूल में दाखिला दिलवाया। कुछ साल तक फरजाना उर्फ नेहा अपने असल माता-पिता के घर नहीं आई, लेकिन उसके बाद उसका दोनों परिवारों में आना जाना शुरू हो गया।


उत्तराखंड पर शीर्ष समाचार