उत्तराखंड: क्या पूर्व मुख्यमंत्री कर रहे 'भजन-भोजन' की दलित सियासत?

Edited by: Shanker_Mishra Updated: 05 Feb 2018 | 08:59 PM
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देहरादून। बीते विधानसभा चुनावों में पार्टी और खुद अपनी करारी हार के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत रण छोड़ने को तैयार नहीं है। इसी हार का कारण जानने के लिए भगवान के दर पर जाने की घोषणा करने वाले हरीश रावत ने रविवार को नेशविला रोड स्थित वाल्मीकि मंदिर में कीर्तन में हिस्सा लिया।

वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री ने पहले देहरादून में दलितों के घर भोजन किया और फिर प्रदेश भर के मंदिरों के दर्शन के अभियान की शुरूआत कर दी। हरीश रावत ने बकायदा देहरादून के टपकेश्वर मंदिर में पहुंचकर दलितों के साथ भजन कीर्तन करके भक्तों को प्रसाद भी बांटा।

बता दें कि अखिल भारतीय अनुसूचित जाति युवजन सभा की ओर से आयोजित कार्यक्रम में हरीश रावत ने कहा कि वो अगले कुछ महीनों तक लगातार मंदिरों में जाकर भजन-कीर्तन करेंगे और जनता से लोकसभा और विधानसभा चुनाव में हार का कारण भी जानेंगे। साथ ही जनता के बीच जाकर नरेंद्र मोदी मॉडल पर भी चर्चा करेंगे।

साथ ही देहरादून व हल्द्वानी में कांग्रेस की रैली में शामिल नहीं होने पर सोशल मीडिया में चल रही तकरार पर कहा कि ये बहस चटखारे लेने के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे अगले चुनाव तक पार्टी को मजबूत करने की मंशा है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या हरीश रावत अपने दम पर सूबे की सिसासत में अपनी ताकत का नए सिरे से अहसास कराने की जुगत में लगे हैं। क्या हरीश रावत 'भजन-भोजन' की दलित सियासत कर रहे?