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क्यों सस्ती होती हैं जैनेरिक दवाएं और क्यों है ये खास

Edited By: Vijayashree Gaur
Updated On : 2017-04-17 05:45:05
क्यों सस्ती होती हैं जैनेरिक दवाएं और क्यों है ये खास
क्यों सस्ती होती हैं जैनेरिक दवाएं और क्यों है ये खास

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दो दिन के गुजरात दौरे के दौरान सूरत में किरण मल्टी सुपर स्पेशिएलिटी हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर का उद्घाटन किया है और इस दौरान देश को सस्ते इलाज मुहैया कराने का दावा किया, साथ ही जेनेरिक दवाइयों के इस्तेमाल पर जोर दिया। तो चलिए जानते हैं क्या होती हैं जेनेरिक दवाएं। बाकी दवाओं से यह कैसे अलग हैं। साथ ही यह भी बताएंगे कि इससे इलाज कैसे सस्ता हो सकता है और यह क्यों सस्ती मिलती हैं।

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दरअसल, जेनरिक दवाइयां सस्ती होती हैं, दवाइयों का खर्चा इससे कम आएगा और कुलमिलाकर इलाज सस्ता हो जाएगा।किसी एक बीमारी के इलाज के लिए तमाम तरह की रिसर्च और स्टडी के बाद एक रसायन (साल्ट) तैयार किया जाता है जिसे आसानी से उपलब्ध करवाने के लिए दवा की शक्ल दे दी जाती है।

इस साल्ट को हर कंपनी अलग-अलग नामों से बेचती है। कोई इसे महंगे दामों में बेचती है तो कोई सस्ते, लेकिन इस साल्ट का जेनेरिक नाम साल्ट के कंपोजिशन और बीमारी का ध्यान रखते हुए एक विशेष समिति द्वारा निर्धारित किया जाता है।

किसी भी साल्ट का जेनेरिक नाम पूरी दुनिया में एक ही रहता है।अधिकत्तर बड़े शहरों में एक्सक्लुसिव जेनेरिक मेडिकल स्टोर होते हैं, लेकिन इनका ठीक से प्रचार-प्रसार ना होने के कारण इसका लाभ लोगों को नहीं मिल पाता।

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आमतौर पर डॉक्टर्स महंगी दवाएं लिखते हैं इससे ब्रांडेड दवा कंपनियां खूब मुनाफा कमाती हैं लेकिन क्या आप जानते हैं आप डॉ. की लिखी सस्ती दवाएं भी खरीद सकती हैं। जी हां, आपका डॉक्टर आपको जो दवा लिखकर देता है उसी साल्ट की जेनेरिक दवा आपको बहुत सस्ते में मिल सकती है।

महंगी दवा और उसी साल्ट की जेनेरिक दवा की कीमत में कम से कम पांच से दस गुना का अंतर होता है। कई बार जेनरिक दवाओं और ब्रांडेड दवाओं की कीमतों में 90 पर्सेंट तक का भी फर्क होता है।

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जेनेरिक दवाओं की डोज, उनके साइड-इफेक्ट्स सभी कुछ ब्रांडेड दवाओं जैसे ही होते हैं। जैसे इरेक्टाइल डिस्फंक्शन के लिए वियाग्रा बहुत पॉपुलर है, लेकिन इसकी जेनेरिक दवा सिल्डेन्फिल नाम से मौजूद है, लेकिन लोग वियाग्रा लेना ही पसंद करते हैं क्योंकि यह बहुत पॉपुलर ब्रांड हो चुका है। इसकी खूब पब्लिसिटी इंटरनेशनल लेवल पर की गई है।

ठीक इसी तरह से ब्लड कैंसर के लिए ‘ग्लाईकेव’ ब्राण्ड की दवा की कीमत महीनेभर में 1,14,400 रूपए होगी, जबकि दूसरे ब्रांड की ‘वीनेट’ दवा का महीने भर का खर्च 11,400 से भी कम आएगा।

जहां पेंटेट ब्रांडेड दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं वहीं जेनेरिक दवाओं की कीमत को निर्धारित करने के लिए सरकार का हस्तक्षेप होता है। जेनेरिक दवाओं की मनमानी कीमत निर्धारित नहीं की जा सकती। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक, डॉक्टर्स अगर मरीजों को जेनेरिक दवाएं प्रिस्क्राइब करें तो विकसित देशों में स्वास्थय खर्च 70 पर्सेंट और विकासशील देशों में और भी अधिक कम हो सकता है।

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कई बार डॉक्टर सिर्फ साल्ट का नाम लिखकर देते हैं तो कई बार सिर्फ ब्रांडेड दवा का नाम। कुछ खास बीमारियां हैं जिसमें जेनेरिक दवाएं मौजूद होती हैं लेकिन उसी सॉल्ट की ब्रांडेड दवाएं महंगी आती हैं। यह बीमारियां हैं जैसे- हार्ट डिजीज, न्यूरोलोजी, डायबिटीज, किडनी, यूरिन, बर्न प्रॉब्लम। इन बीमारियों की जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं की कीमतों में भी बहुत ज्यादा अंतर देखने को मिलता है।

 

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