जयंती विशेष : डाकू रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बनने का सफर

Author: Hindi Khabar
Updated On : 2016-10-16 15:54:45
जयंती विशेष : डाकू रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बनने का सफर

नई दिल्ली। पूरे भारत में 16 अक्टूबर को महर्षि वाल्मीकि की जयंती मनाई जा रही है। महर्षि वाल्मीकि प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों की श्रेणी में प्रमुख स्थान रखते हैं। महर्षि द्वारा रचित रमायाण वाल्मीकि रामायण कहलाती है। एक बार ध्यान में मग्न होकर बैठे हुए इनके शरीर को दीमकों ने अपना ढूह (बांबी) बनाकर ढंक लिया था। साधना पूरी करके जब वह दीमक ढूह से बाहर निकले तो इन्हें वाल्मीकि कहा जाने लगा।

ऐसा माना जाता है कि संस्कृत भाषा का पहला श्लोक वाल्मीकि के ही मुख से निकला था। महर्षि कोई ब्राह्मण नहीं थे बल्कि एक डाकू थे। महर्षि बनने से पहले दुनिया उन्हें रत्नाकर के नाम से जानती थी।, परिवार का पोषण करने के लिए रत्नाकर दस्तुकर्म करते थे।

एक बार उन्होंने वन में नारद मुनि को लूटने का प्रयास किया था, तब नारद ने महर्षि से पूछा था कि वो यह काम क्यों करते हैं। तब वाल्मीकि ने जवाब दिया था कि वह यह काम अपने परिवार का पोषण करने के लिए करते है। वाल्मीकि के इस प्रश्न के बाद


नारद ने पूछा था कि तुम जो भी अपराध करते हो और जिस परिवार के पालन के लिए तुम इतने अपराध करते हो, क्या वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार होंगे। नारद मुनि की यह बात सुनकर वाल्मीकि भौंचक्के रह गए थे और नारदा को कोई जवाब नहीं दे पाए थे।

तब नारदा ने कहा था कि रत्नाकर यदि तुम्हारे परिवार वाले इस कार्य में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिए यह पाप करते हो। इस बात को सुनकर उन्होंने नारद के चरण पकड़ लिए और डाकू का जीवन छोड़कर तपस्या में लीन हो गए।


उस समय नारद ने वाल्मीकि को राम-नाम का जप करने और सत्य के ज्ञान से अवगत कराया था। उस समय वाल्मीकि राम नाम का सही उच्चारण करने में असमर्थ साबित हुए, तब उन्हें नारद ने मरा-मरा का जप करने के लिए कहा था।

वाल्मीकि रामायण की रचना के पीछे महर्षि की एक कहानी प्रख्यात मानी जाती है, एक बार महर्षि वाल्मीकि नदी के किनारे क्रोंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे, वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी एक व्याघ्र ने क्रोंच पक्षी के जोड़े में से एक को तीर मार दिया। इस तीर से नर पक्षी की मृत्यु हो जाने से मादा पक्षी विलाप में तड़पने लगी थी। उस समय वाल्मीकि के मुख से स्वत: ही-

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत्क्रौंचमिथुनादेक म् अवधी: काममोहितं।।

नामक श्लोक निकला और वही महाकाव्य रामायण का आधार बना था, जिसके बाद उन्होंने रामायण की रचना की थी।


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